دوشنبه سیزدهم اردیبهشت ۱۳۸۹
| به چشمك اينهمه مژگان به هم مزن يارا | |
| كه اين دو فتنه بهم ميزنند دنيا را | |
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| چه شعبده است كه در چشمكان آبي تو | |
| نهفتهاند شب ماهتاب دريا را | |
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| تو خود به جامهء خوابي و ساقيان صبوح | |
| به ياد چشم تو گيرند جام صهبا را | |
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| كمند زلف به دوش افكن و به صحرا زن | |
| كه چشم مانده به ره آهوان صحرا را | |
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| به شهر ما چه غزالان كه باده پيمايند | |
| چه جاي عشوه، غزالان بادپيما را | |
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| فريب عشق به دعوي اشگ و آه مخور | |
| كه درد و داغ بود عاشقان شيدا را | |
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| هنوز زين همه نقاش ماه و اختر نيست | |
| شبيه سازتر از اشگ من ثريا را | |
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| اشاره غزل خواجه با غزالهء تست | |
| »صبا به لطف بگو، آن غزال رعنا را« | |
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| به يار ما نتوان يافت شهريارا عيب | |
| جز اين قدر كه فراموش ميكند ما را | |
نوشته شده توسط بهرام محرم زاده
در 0:43 |
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