سه شنبه سیزدهم اردیبهشت ۱۳۹۰
| اين چه سوداست كز تو در سر ماست | |
| وين چه غوغاست كز تو در بر ماست | |
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| از تو در ما فتاده شور و شري | |
| اين همه شور و شر نه در خور ماست | |
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| تا تو كردي به سوي ما نظري | |
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| آتشي كز تو در نهاد دل است | |
| تا ابد رهنماي و رهبر ماست | |
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| ديدهاي كو كه روي تو بيند | |
| ديده تيره است و يار در بر ماست | |
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| ورنه روي تو در برابر ماست | |
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نوشته شده توسط بهرام محرم زاده
در 3:51 |
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شنبه دهم اردیبهشت ۱۳۹۰
| مرا گويي كه رايي من چه دانم | |
| چنين مجنون چرايي من چه دانم | |
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| مرا گويي بدين زاري كه هستي | |
| به عشقم چون برآيي من چه دانم | |
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| مرا گويي كجايي من چه دانم | |
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| مرا گويي به قربانگاه جانها | |
| نميترسي كه آيي من چه دانم | |
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| چه داري از خدايي من چه دانم | |
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| مرا گويي چه مي جويي دگر تو | |
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| مرا گويي تو را با اين قفص چيست | |
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| ار آن ترك خطايي من چه دانم | |
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| بلا را از خوشي نشناسم ايرا | |
| به غايت خوش بلايي من چه دانم | |
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| ز من يكتا دو تايي من چه دانم | |
نوشته شده توسط بهرام محرم زاده
در 1:30 |
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شنبه دهم اردیبهشت ۱۳۹۰
| من ندانستم از اول كه تو بي مهر و وفايي | |
| عهد نابستن از آن به كه ببندي و نپايي | |
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| دوستان عيب كنندم كه چرا دل به تو دادم | |
| بايد اول به تو گفتن كه چنين خوب چرايي | |
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| اي كه گفتي مرو اندر پي خوبان زمانه | |
| ما كجاييم در اين بحر تفكر تو كجايي | |
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| آن نه خالست و زنخدان و سر زلف پريشان | |
| كه دل اهل نظر برد كه سريست خدايي | |
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| پرده بردار كه بيگانه خود اين روي نبيند | |
| تو بزرگي و در آيينه كوچك ننمايي | |
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| حلقه بر در نتوانم زدن از دست رقيبان | |
| اين توانم كه بيايم به محلت به گدايي | |
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| عشق و درويشي و انگشت نمايي و ملامت | |
| همه سهلست تحمل نكنم بار جدايي | |
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| روز صحرا و سماعست و لب جوي و تماشا | |
| در همه شهر دلي نيست كه ديگر بربايي | |
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| گفته بودم چو بيايي غم دل با تو بگويم | |
| چه بگويم كه غم از دل برود چون تو بيايي | |
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| شمع را بايد از اين خانه به دربردن و كشتن | |
| تا به همسايه نگويد كه تو در خانه مايي | |
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| سعدي آن نيست كه هرگز ز كمندت بگريزد | |
| كه بدانست كه دربند تو خوشتر كه رهايي | |
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| خلق گويند برو دل به هواي دگري ده | |
| نكنم خاصه در ايام اتابك دو هوايي | |
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نوشته شده توسط بهرام محرم زاده
در 0:39 |
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پنجشنبه هشتم اردیبهشت ۱۳۹۰
| برويد اي حريفان بكشيد يار ما را | |
| به من آوريد آخر صنم گريزپا را | |
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| به ترانههاي شيرين به بهانههاي زرين | |
| بكشيد سوي خانه مه خوب خوش لقا را | |
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| وگر او به وعده گويد كه دمي دگر بيايم | |
| همه وعده مكر باشد بفريبد او شما را | |
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| دم سخت گرم دارد كه به جادوي و افسون | |
| بزند گره بر آب او و ببندد او هوا را | |
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| به مباركي و شادي چو نگار من درآيد | |
| بنشين نظاره ميكن تو عجايب خدا را | |
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| چو جمال او بتابد چه بود جمال خوبان | |
| كه رخ چو آفتابش بكشد چراغها را | |
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| برو اي دل سبك رو به يمن به دلبر من | |
| برسان سلام و خدمت تو عقيق بيبها را | |
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نوشته شده توسط بهرام محرم زاده
در 2:58 |
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پنجشنبه هشتم اردیبهشت ۱۳۹۰
| عشق تو آورد قدح پر ز بلاها | |
| گفتم مي مينخورم پيش تو شاها | |
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| مست شدم برد مرا تا به كجاها | |
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| از طرفي روح امين آمد پنهان | |
| پيش دويدم كه ببين كار و كياها | |
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| گفتم اي سر خدا روي نهان كن | |
| شكر خدا كرد و ثنا گفت دعاها | |
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| گفتم خود آن نشود عاشق پنهان | |
| چيست كه آن پرده شود پيش صفاها | |
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| عشق چو خون خواره شود واي از او واي | |
| كوه احد پاره شود خاصه چو ماها | |
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| شاد دمي كان شه من آيد خندان | |
| باز گشايد به كرم بند قباها | |
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| گويد افسرده شدي بينظر ما | |
| پيشتر آ تا بزند بر تو هواها | |
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| گويد كان لطف تو كو اي همه خوبي | |
| بنده خود را بنما بندگشاها | |
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| گويد ني تازه شوي هيچ مخور غم | |
| تازهتر از نرگس و گل وقت صباها | |
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| گويم اي داده دوا هر دو جهان را | |
| نيست مرا جز لب تو جان دواها | |
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| ميوه هر شاخ و شجر هست گوايش | |
| روي چو زر و اشك مرا هست گواها | |
نوشته شده توسط بهرام محرم زاده
در 2:50 |
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